बलिया ददरी मेला का इतिहास बहुत ही पुराना है। कहते हैं कि महर्षि भृगु के शिष्य दर्दर मुनि के नाम पर यह मेला सैकड़ों साल पहले शुरू हुआ था ,जो आज भी जारी है । यह मेला एक समय काल में पशुओं की खरीद बिक्री के लिए बेहद लोकप्रिय था और इसे एशिया का दूसरा सबसे बड़ा मेला का तमगा दिया गया था। एक दौर वह भी था ,जब छात्र बलिया के कॉलेज में अध्ययन के समय अपना ज्यादा समय इसी मेले में गुजारते थे । करीब 25 से 30 साल पहले इस मेले में युवाओं का एक बड़ा हुजूम शामिल होता था। मेला परिसर युवाओं से यह भरा रहता था । ग्राम देहात के लोग भी मेले की ओर आकर्षित होते थे ।पशुओं की खरीद बिक्री करने वालों की भी भरमार होती थी ।वह बड़ी-बड़ी चरखी और मौत का कुआं, सर्कस लोगों में चर्चा का विषय हुआ करता था ।बलिया टीडी कॉलेज, बलिया सतीश चंद्र कॉलेज , कुंवर सिंह कॉलेज के अधिकांश छात्र इस मेले की मानो शान हुआ करते थे ,लेकिन बदलते समय के साथ यह मेला सिकुड़ता चला जा रहा है।एक समय यह मेला शनिचरी मंदिर इलाके से विस्तृत क्षेत्र में फैलाव लिए रहता था। दूर-दूर तक तंबू ही तंबू नजर आते थे, लेकिन बढ़ते शहरीकरण के चलते मेला परिसर छोटा होते चला गया ।मेला की खासियत यह थी कि ग्राम देहात से लोग खरीदारी करने आते थे और कुछ अच्छी-अच्छी चीज खरीद कर अपने घरों को ले जाते थे। अब आलम यह है कि मेले में ज्यादातर वही चीज बिकती हैं ,जो आम बाजारों में दिखती हैं । वही सर्कस तो कहने सुनने की बात रह गई है,जब से सरकार ने जानवरों के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाए हैं तब से चीज बदलती चली गई है ।अब कुछ चुनिंदा चीजें ही मनोरंजन का साधन रह गई है। ददरी मेला की परंपरा को बचाए रखने के लिए जरूरत है। मेला परिसर को सिकुड़ने ना दिया जाए और नवीनतम चीजों का समागम हो। जो लोगों को आकर्षित करें । महिलाओं ,बच्चों ,बुजुर्गों सभी से जुड़े सामान मेले में भरमार हो तब जाकर फिर से वह ददरी मेला की रौनक लौटेगी। मेला की परंपरा भारतीय संस्कृति मूल्य की धरोहर है ।इसे बचाए रखना होगा ,क्योंकि मेला संस्कृति हमें हमेशा जीवंत बनाए रखती है ।