Wednesday, January 28, 2026
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सोनपुर का मेला नहीं देखा तो समझो जीवन अधूरा ही रह गया

मेला का इतिहास भारत में सदियों

सोनपुर मेला में हाथी

पुराना है। हम कह सकते हैं कि जब मनुष्य गृहस्थ जीवन के बारीकियों से वाकिफ हुआ तो अपने रहन-सहन को समृद्ध करते हुए मनोरंजन समेत अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए इसे आयोजित करना शुरू किया। नदियों के किनारे लगने वाले पुण्य स्नान के साथ ही इसका उद्गम हुआ। उस दौर में छोटे-छोटे हाट लगते थे और बाजार का कोई कॉन्सेप्ट नहीं था। लोग अपनी जरूरत की चीज यहां से हासिल करते थे। समय के साथ मेला में आधुनिकता का रंग भी चढ़ा और इसमें मनोरंजन के ढेर सारे चीज उपयोग में लाई जाने लगी। लेकिन हम कह सकते हैं कि यह आर्य संस्कृति को समृद्ध करने वाला एक ऐसी श्रृंखला थी, जो कई दशकों से चलती आ रही है। हां यह जरूर है कि समय के साथ इसमें कुछ बदलाव भी हुए हैं, लेकिन इसका जारी रहना भी अपने आप में कम गर्व का विषय नहीं है। जब आधुनिक दौर में फिल्मी दुनिया के अलावा तमाम मनोरंजन के साधन है ,तब भी यह भारतीय संस्कृति को सम्मिलित करते आ रहा मेला की कड़ी में आज हम बात करने जा रहे हैं एशिया के सबसे प्रमुख पशु व सांस्कृतिक सोनपुर मेला के बारे में-

सोनपुर मेला बिहार के सारण जिले में गंगा और गंडक नदियों के संगम पर आयोजित होने वाला एक विशाल और ऐतिहासिक मेला है, जिसे हरिहर क्षेत्र मेला के नाम से भी जाना जाता है। यह एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है, जो कार्तिक पूर्णिमा के शुभ अवसर पर शुरू होता है। वर्तमान में इसमें पारंपरिक पशु व्यापार के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम, खरीदारी के स्टॉल और आधुनिक मनोरंजन का भी समावेश होता है। यह मेला हर साल नवंबर/दिसंबर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन शुरू होता है और पंद्रह दिनों से एक महीने तक चलता है। यह बिहार के सारण और वैशाली जिलों की सीमा पर सोनपुर में गंगा और गंडक नदियों के संगम पर आयोजित होता है।
इसकी उत्पत्ति प्राचीन काल से हुई है, जब चंद्रगुप्त मौर्य इस मेले में हाथियों और घोड़ों की खरीदारी करते थे। इसे कभी जंगी हाथियों का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था।
यह मेला भगवान हरिहरनाथ (विष्णु और शिव) की पूजा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, इसलिए इसे हरिहर क्षेत्र मेला भी कहा जाता है। भक्त पवित्र स्नान के लिए गंगा और गंडक नदी में डुबकी लगाते हैं और हरिहर नाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं।

सांस्कृतिक और मनोरंजन: अब इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम, विभिन्न सरकारी विभागों के स्टॉल, स्थानीय कला और शिल्प के स्टॉल, और मनोरंजन के लिए झूले और अन्य आकर्षण भी शामिल हैं। मेले में सूई से लेकर हाथी तक सब कुछ खरीदा जा सकता है, जिसमें स्थानीय और आधुनिक उत्पाद, कपड़े और बहुत कुछ शामिल हैं। हालांकि अब हाथियों की संख्या कम हो गई है, लेकिन यह मेला पशुधन व्यापार और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता है, जो आधुनिक गतिविधियों के साथ मिलकर एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।

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