प्रवासी श्रमिक का शब्द अक्सर हमारे कानों तक आता है। भले ही यह शब्द बेहद छोटे हैं ,लेकिन इसके मायने बहुत बड़े हैं। पूरी दुनिया में प्रवासी श्रमिकों की एक बड़ी आबादी बसती है। ऐसा कोई भी देश नहीं है, जहां प्रवासी श्रमिकों की तादाद नहीं है। यह संख्या कुछ कम और ज्यादा जरूर हो सकती है, लेकिन हर जगह उनकी मौजूदगी है। दरअसल यह प्रवासी श्रमिक ही औद्योगिक जगत की रीढ़ होते हैं। इनके बिना उत्पादन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उनके श्रम से ही उत्पादन अपने शिखर तक पहुंचता है और हर जरूरत को पूरा करता है। 18 दिसंबर को प्रवासी श्रमिक दिवस मनाया जाता है। बकायदा संयुक्त राष्ट्र ने भी इस दिवस को अपनी मान्यता दी है। इस मौके पर प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों पर भी चर्चा हो रही है और होनी भी चाहिए ,क्योंकि आने वाले समय में माना जा रहा है कि प्रवासी श्रमिकों की तादाद और बढ़ेगी इनके दम पर ही उत्पादकता निर्भर करेगी। हालांकि अक्सर यह महसूस किया जाता है कि प्रवासी श्रमिकों को उनके मर्जी के अनुसार ना तो श्रम भत्ता मिलता है और ना ही उनकी जरूरत का ख्याल रखा जाता है । प्रवासी श्रमिकों के मानवाधिकार को लेकर समय-समय पर आवाज भी उठते रहे हैं। अब समय आ गया है कि प्रवासी श्रमिकों को लेकर एक जरूरी बहस और पहल हो ताकि दुनिया में बढ़ते प्रवासी श्रमिकों को उनका वाजिब हक मिले। मानव अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। खास तौर से भारत जैसे देशों में इस पर बेहद ध्यान देने की भी जरूरत है, क्योंकि भारत के प्रत्येक राज्य में प्रवासी श्रमिकों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर है। प्रवासी श्रमिकों में सबसे बड़ी तादाद यूपी बिहार के लोगों की होती है। उनके बलबूते ही बड़े-बड़े कारखाने संचालित होते हैं, लेकिन कई बार इन्हें श्रमदान करके भी अपने हक के लिए मायूस होना पड़ता है। ऐसे में अब इनका इनका वाजिब हक मिलना ही चाहिए।
प्रवासी श्रमिकों को मिले उनका हक
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