यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के नए नियमावली पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से कहा गया है कि नए आदेश आने तक पुराने नियम ही लागू रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर 19 फरवरी को फिर सुनवाई करेगा और इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को जवाब देने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा है कि नई नियमावली में इसके दुरुपयोग की संभावना थी । नई नियमावली बिल्कुल अस्पष्ट थी । इसे स्पष्टता के साथ सामने लाने की जरूरत है।उन्होंने यह भी कहा कि जो उत्पीड़ित है, उनकी हम अनदेखी नहीं कर सकते, लेकिन चीजें स्पष्ट होनी चाहिए थी। अब देखना है कि यूजीसी और केंद्र सरकार की ओर से इस पर क्या जवाब दिए जाते हैं।
सभी पक्षों को विश्वास में लिया जाना चाहिए था:
लगे हाथ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस पर राजनीति भी शुरू हो गई है, जहां भाजपा सुप्रीमो मायावती ने सुप्रीम कोर्ट के फैसला को सही ठहराते हुए कहा कि अगर यूजीसी की नई नियमावली बनाने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में ले लिया गया होता और उच्च जातियों को नई नियमावली में प्रतिनिधित्व दे दिया गया हो तो इस तरह की समस्या नहीं होती । जिस तरह से समाज में तनाव बन रहा था, यह सही नहीं था। कोर्ट ने सही समय पर सही निर्णय दिया। वहीं अखिलेश यादव ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि ना किसी का उत्पीड़न हो और ना किसी के साथ अन्याय हो। दरअसल यूजीसी की ओर से नई नियमावली में समता के अधिकार को सामने रखकर ईओसी कमेटी बनाई गई थी, जिसमें हर वर्ग को प्रतिनिधित्व तो मिला, लेकिन सवर्ण वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया और इसको लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में काफी बवाल हुए। रैलियां निकाली गई। लोगों ने केंद्र सरकार के ऊपर आरोप लगाते हुए नारेबाजी की और यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया । सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नई नियमावली पर रोक लगा दिए हैं। दरअसल जब उच्च शिक्षण संस्थानों में किसी छात्र के साथ जातिगत आधार पर भेदभाव किया जाता है तो वह अपनी बात कमेटी के समक्ष रख सकता है। यह नियमावली पहले सिर्फ अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए थी, लेकिन इसमें नए सिरे से ओबीसी को भी शामिल करते हुए उनका भी प्रतिनिधित्व दिया गया, लेकिन सवर्ण को इस वंचित रखा गया। ऐसे में सवर्णों का कहना था कि यदि उनके छात्रों के साथ भी कुछ गलत होता है तो वह कहां जाएंगे और जब कमेटी में उनका प्रतिनिधित्व नहीं होगा तो कहीं ना कहीं उन्हें डर के माहौल में जीना होगा। पूरी घटनाक्रम पर देखा जाए तो केंद्र सरकार बैक फुट पर है ,क्योंकि यूजीसी की नई नियमावली को सीधे तौर पर केंद्र सरकार से जोड़ा जा रहा है। अब देखना है कि केंद्र सरकार इसकी भरपाई किस तरह से करती है।

