Tuesday, November 3, 2026
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सच उजागर करने की कीमत आखिर कब तक चुकानी होगी?

पत्रकारों की सुरक्षा ही लोकतंत्र की सुरक्षा है

अरुण कुमार  (वरिष्ठ पत्रकार )

 

समाचार संकलन, तथ्यों की पड़ताल, सच्चाई को सामने लाना और भ्रष्टाचार तथा अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाना पत्रकारिता की बुनियादी जिम्मेदारी है। लेकिन इस दायित्व को निभाने की कीमत दुनिया भर में पत्रकारों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। पिछले 25 वर्षों में विश्वभर में दो हजार से अधिक पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की हत्या हो चुकी है। इराक, सीरिया, मैक्सिको, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, यूक्रेन और फिलिस्तीन सहित अनेक देशों में पत्रकारों की हत्याओं ने प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2 नवंबर को ‘International Day to End Impunity for Crimes Against Journalists’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। माली में दो फ्रांसीसी पत्रकारों की हत्या की घटना के बाद इस दिवस की शुरुआत हुई। यूनेस्को के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में पत्रकारों की हत्या के लगभग सात में से छह मामलों में दोषियों को सजा नहीं मिल पाती। यह स्थिति बताती है कि पत्रकारों की हत्या करने वाले अपराधियों का कानून के शिकंजे से बच निकलना आज भी एक गंभीर वैश्विक समस्या है।

पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न देशों ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। मैक्सिको में वर्ष 2012 में विशेष कानून बनाया गया, जबकि कोलंबिया में जोखिम का सामना कर रहे पत्रकारों की सुरक्षा के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किया गया। यूरोपीय संघ का European Media Freedom Act भी मीडिया की स्वतंत्रता और सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

भारत में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार के रूप में सुनिश्चित है। इसके बावजूद पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अभी तक कोई अलग और व्यापक केंद्रीय कानून नहीं बनाया गया है। महाराष्ट्र में वर्ष 2017 में लागू पत्रकार सुरक्षा कानून इस दिशा में एक उल्लेखनीय पहल जरूर है।

आज पत्रकारों के सामने चुनौतियां केवल शारीरिक हमलों तक सीमित नहीं हैं। विशेषकर महिला पत्रकारों को ऑनलाइन उत्पीड़न, चरित्रहनन, साइबर धमकियों और संगठित दुष्प्रचार का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों, स्वतंत्र पत्रकारों और छोटे समाचार संस्थानों से जुड़े मीडियाकर्मियों की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। उनके पास न तो पर्याप्त संस्थागत सुरक्षा होती है और न ही संकट के समय जरूरी कानूनी एवं आर्थिक सहायता।

हालांकि, पत्रकारिता की स्वतंत्रता के साथ पेशेवर ईमानदारी, तथ्यों की पुष्टि और निष्पक्षता भी अनिवार्य है। पत्रकारों को सुरक्षित कार्य वातावरण, जीवन बीमा, कानूनी सहायता और हमलों के मामलों में त्वरित एवं निष्पक्ष न्याय उपलब्ध कराना सरकार, प्रशासन और मीडिया संस्थानों की साझा जिम्मेदारी है।

पत्रकारों से भी अपेक्षा है कि वे भय, प्रलोभन और राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर तथ्यों और सत्य के पक्ष में खड़े रहें। साथ ही, किसी सहकर्मी पर संकट आने पर एकजुट होकर उसकी सुरक्षा और न्याय के लिए आवाज उठाएं। पत्रकारिता की विश्वसनीयता और गरिमा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

एक पत्रकार की हत्या केवल एक परिवार के सपनों का अंत नहीं होती, बल्कि कई बार उस सच की भी हत्या होती है, जो समाज और देश के सामने आना चाहिए था।

पत्रकारों की सुरक्षा केवल किसी एक पेशे या समुदाय का सवाल नहीं है। यह नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की बुनियादी मजबूती से जुड़ा विषय है।

पत्रकार सुरक्षित रहेंगे, तभी समाचारों की स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी और समाचारों की स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी, तभी लोकतंत्र की आवाज बुलंद रहेगी।

फोटो : इंटरनेट मीडिया

साभार: (लेखक के निजी विचार)

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