आधुनिकता के इस दौर में पुरबिया संस्कृति को काफी आघात पहुंचा है। हमारे लोकगीत मानो खत्म होते जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर लोक गीत कजरी, ठुमरी जैसी हमारी लोक संस्कृति कहीं गुम सी हो गई है। ये जो हमारी लोक परंपरा है वह विलुप्त होने के कगार पर है । नई जनरेशन की रुचि की बात करें तो उसे तो बस हिप हॉप ही भा रहा है । पॉप म्यूजिक पर वह झूम रहे हैं । उन्हें शायद इस बात का इलम भी नहीं की हमारी लोक संस्कृति कितनी संबृद्ध रही है । अब हमें इस पर गौर करने की जरूरत है।
हम पश्चिम की संस्कृति की नकल करें इस पर कोई रोक नहीं है, पर अपनी धरोहर को तो समेटे। इस वजह से हमारे जो पुरबिया संस्कृति है, वह कहीं ना कहीं पीछे रह जाती है। नई पीढ़ी अगर पुरबिया संस्कृति के प्रति उदार बने तो हम एक लंबी सी छलांग लगा सकते हैं और यह आज की जरूरत है। क्योंकि पूर्वांचल की जो संस्कृति है, वह अनोखा है। मकर संक्रांति बस आने ही वाला है और इस दौरान हमें पुरबिया की संस्कृति पूरी तरह से दिखने लग जाएगी। जब खेतों में पीले पीले सरसों के फूल खिलेंगे और माघ मकर संक्रांति को हम आत्मसात करते नजर आएंगे। अगर इस कड़ी में ही हम अपने संस्कृति के अन्य कड़ी जोड़ते जाएं तो काफी आगे तक जा सकते है।
प्रस्तुति : स्वाति सिंह

