महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना का नाम बदलकर पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना कर दिया गया है। सरकार की ओर से अब 100 दिन के बदले साल में 125 दिन काम सुनिश्चित करने की का प्रावधान भी किया गया है, यानी कि अब साल में श्रमिकों को ग्रामीण स्तर पर 125 दिन का सुनिश्चित काम मिलेगा । केंद्र सरकार के इस फैसले का जहां सत्ता पक्ष की ओर से स्वागत हुआ है, वही विपक्ष के तौर पर कांग्रेस ने आलोचना तो नहीं की है ,लेकिन उनकी मंशा पर सवाल जरूर उठाएं है। पत्रकारों की ओर से जब केंद्र सरकार द्वारा नाम बदले जाने पर प्रियंका गांधी की राय लेने की कोशिश की गई तो उन्होंने बड़े ही बेबाक तरीके से कहा कि उन्हें समझ में नहीं आया कि यह नाम बदलकर क्या हासिल होगा। इसके पीछे सरकार की असल मंशा क्या है । नाम बदलने से धनराशि तो खर्च होती ही है कोई भी नाम बदले जाने के बाद उसके लिए कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है और उसमें जरूरी रिसोर्सेज को लगाना पड़ता है।
दरअसल डॉक्यूमेंटेशन में यह जरूरी होता है कि सभी जगह इस नाम को रखा जाए। केंद्र सरकार की ओर से समय-समय पर सरकारी प्रतिष्ठान तथा योजनाओं के नाम बदले जाते रहे हैं। सरकार का तर्क रहा है कि इससे कामकाज के प्रति नजरिया बदलता है। इसका अपना एक खास असर भी होता है । उदाहरण के तौर पर जैसे योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया गया। इस तरह कई अन्य योजनाओं व सरकारी प्रतिष्ठानों के नाम बदले गए। जैसे इनकम टैक्स विभाग का नाम बदलकर जीएसटी भवन कर दिया गया । इस तरह से कई आमूल चूल बदलाव किए गए हैं। सरकार के अपने तर्क हैं। उसके तर्क से आप सहमत हो या न हो ,लेकिन सरकार को लगता है कि यह होना चाहिए तो होता है ।लेकिन विपक्ष के सवाल भी वाजिब है कि सिर्फ नाम बदल देने से चीज नहीं बदल जाती बल्कि रिजल्ट क्या आया यह देखा जाना चाहिए। योजना का मकसद निकल कर आना चाहिए

