हिंदुस्तान ऋतुओं और त्योहारों का देश है। उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब की सांस्कृतिक पहचान ‘लोहड़ी’ का पर्व मात्र एक त्योहार नहीं, बल्कि यह कड़कड़ाती ठंड में जीवन की ऊष्मा, रबी की फसल की सुखद दस्तक है।पौष माह की अंतिम रात्रि को जब अलाव की लपटें आकाश को चूमती हैं, तो वे केवल लकड़ियाँ नहीं जलतीं, बल्कि समाज की जड़ता और नकारात्मकता को भी भस्म करने का संदेश देती हैं।
परंपराओं की सोंधी खुशबू
लोहड़ी का पर्व पंजाब की कृषि परंपरा से गहरा नाता रखता है। यह रबी की फसल, विशेषकर गन्ने और सरसों की कटाई के समय आता है। इस दिन सूर्य देव और अग्नि देव की पूजा की जाती है। लोग अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हुए उसमें मूँगफली, रेवड़ी, गजक, पॉपकॉर्न और तिल अर्पित करते हैं। इसे ‘चर्खा चढ़ाना’ या ‘आहुति देना’ कहा जाता है। मान्यता है कि अग्नि में अर्पित ये चीजें भविष्य की समृद्धि और अच्छी फसल की प्रार्थना का माध्यम हैं। रात के समय मक्की की रोटी और सरसों का साग इस पर्व के स्वाद को पूर्णता प्रदान करता है। मान्यता है कि अग्नि में डाली गई ये वस्तुएँ अच्छी फसल के लिए ईश्वर को दिया गया धन्यवाद है। अग्नि को समर्पित किया जाने वाला तिल और गुड़ का मेल केवल स्वास्थ्यवर्धक नहीं, बल्कि संपन्नता का प्रतीक है। ‘तिल’ के दाने की तरह समृद्धि बढ़ने की कामना की जाती है।
लोहड़ी मनाने के लिए छोटे बच्चों की टोलियाँ घर-घर जाकर लोहड़ी माँगती हैं, जो सामाजिक सद्भाव और आपसी जुड़ाव को दर्शाता है। लोहड़ी के गीतों के बिना यह उत्सव अधूरा ही रहता है। छोटे बच्चों की टोलियाँ जब घर-घर जाकर “दे माई लोहड़ी, तेरी जीवे जोड़ी” गाती हैं, तो यह आपसी स्नेह और दुआओं का आदान-प्रदान होता है। इन गीतों में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मिट्टी से जुड़ाव और बुजुर्गों के प्रति सम्मान झलकता है। लोहड़ी का त्यौहार हमारी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था और गौरवशाली इतिहास का दर्पण है। यह हमें सिखाती है कि कैसे कड़ाके की ठंड (चुनौतियों) के बीच भी हंसी, नृत्य और अग्नि की गर्मी से जीवन को उत्सव बनाया जा सकता है।
नव-विवाहितों की लोहड़ी:
जिस घर में नई बहू आई होती है, वहाँ लोहड़ी का आयोजन किसी उत्सव से कम नहीं होता। नई बहू सज-धज कर अग्नि पूजन करती है और बड़े-बुजुर्ग उसे सुख-सौभाग्य का आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा परिवार में नए सदस्य के प्रति प्रेम और स्वीकार्यता का प्रतीक है। इसी तरह घर में शिशु के आगमन के बाद आने वाली पहली लोहड़ी पर ‘मंगण’ की रस्म होती है। रिश्तेदार और मित्र ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा डालते हुए अपनी खुशियाँ साझा करते हैं। यह नवजात के दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना का सामूहिक अवसर होता है।
अब बेटियों की भी लोहड़ी
परंपराओं की सबसे बड़ी खूबसूरती उनका समय के साथ ढलना है। पुराने समय में लोहड़ी मुख्य रूप से पुत्र रत्न की प्राप्ति पर मनाई जाती थी, लेकिन आज पंजाब की मिट्टी से एक नई क्रांति की गूँज सुनाई दे रही है। अब समाज में बेटियों के जन्म पर भी उतनी ही धूमधाम से ‘लोहड़ी’ मनाई जा रही है। गाँवों और शहरों में अब ‘बेटियों की लोहड़ी’ का आयोजन कर समाज को लैंगिक समानता का कड़ा संदेश दिया जा रहा है। यह बदलाव दुल्ला भट्टी के उस संकल्प को और भी मजबूत करता है जिसमें उन्होंने कन्याओं की रक्षा को सर्वोपरि माना था।
- सामाजिक समरसता का अवसर
आज की तनावपूर्ण जीवनशैली में लोहड़ी मौज-मस्ती और उल्लास का वह झोंका है, जो लोगों को जोड़ने का काम करता है। ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा केवल नृत्य नहीं, बल्कि मन के तनाव को दूर करने की एक सामूहिक थेरेपी है। गांव – मोहल्ले के लोग जब एक ही अलाव के चारों ओर बैठते हैं, तो पुराने गिले-शिकवे धुएँ की तरह उड़ जाते हैं और गुड़-तिल की मिठास रिश्तों में घुल जाती है। कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में भी भारतीय मूल के लोग इसी भाईचारे और प्रेम के कारण सात समंदर पार भी अपनी मिट्टी की खुशबू को जीवित रखे हुए हैं।

