बनारस यानी काशी में इन दोनों सौंदर्यीकरण के नाम पर जगह-जगह तोड़फोड़ मची है। खासतौर से घाट इलाके में इन दोनों हलचल है। बेतरतीब तरीके से घाटों को तोड़ने को लेकर हंगामा खड़ा हो गया है । बनारस के लोग ही अब इस पर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब कहा था कि हम काशी का विकास जापान क्वेटो के तर्ज पर विकसित करेंगे तो लगा था कि पीएम के पास इस आध्यात्मिक और सांस्कृतिक नगरी के लिए एक खास प्लान और एजेंडा है। 2014 में इसकी चर्चा भी हुई थी ,लेकिन देखते-देखते काशी को क्योटो नहीं बल्कि व्यावसायिक हब में तब्दील कर दिया गया ।काशी तो धर्म की नगरी थी, इसे धर्म की नगरी ही रहने देने से अच्छा होता। यह तो आध्यात्मिक शांति के लिए जानी जाती है, लेकिन आज वहां जो कोलाहल और शोर है । एक भीड़ दिखती है उससे मन बेचैन और अशांत हो जाता है।
समय के साथ व्यावसायिक हब में हुआ तब्दील:
थोड़ी सी शांति मणिकर्णिका घाट व हरिश्चंद्र घाट पर जाकर मिलती थी, उसे भी कुछ इस तरह से निखारा जा रहा है कि वह भी व्यावसायिक हब के रूप में धीरे-धीरे तब्दील हो ही जाएगा। बनारस की अपनी परंपरा थी। अपनी एकात्मता थी। अपनी सांस्कृतिक विरासत थी वह अब ढूंढने से भी शायद ना मिले। इस मामले में तो कम से कम हम जापान और चीन से सीख सकते हैं। उन लोगों ने अपने धार्मिक विरासत को आधुनिकता के बावजूद बैगर ज्यादा छेड़े उसी रूप में सहेजने का प्रयास किया है और ऐसा होना भी चाहिए कि जो भी आदिकाल की प्राचीन धरोहर हैं ,उनको इस रूप में सहेजा जाना चाहिए । मार्बल और टाइल्स लगाने से आध्यात्मिक की नगरी का स्वरूप ही बदल जाता है। वह मिट्टी ,वह पीपल के पेड़ के नीचे, वह चबूतरे पर जो मन को शांति मिलती है उसका मुकाबला तो इससे हो ही नहीं सकता है। अब सरकारों को कौन समझाए कि यह किसी के हित में नहीं है ।लेकिन वह तो अपनी जिद पर आमदा हैं । प्रधानमंत्री कहते हैं की मां गंगा ने उन्हें बुलाया है ,लेकिन पिछले चुनाव में जिस तरह से उन्हें वोटो से पिछड़ना पड़ा था उससे यह साबित हो गया है कि धीरे-धीरे प्रधानमंत्री से बनारस का मोह भंग हो रहा है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट का सुंदरीकरण के नाम पर जो तोड़फोड़ मची है ,वह सही नहीं है । आप बुलडोजर लगाकर किस तरह का विकास करना चाहते हैं ।यह कतई सही नहीं है। लेकिन सरकार है और उसकी मर्जी है। जो भी हो इतना तो तय है कि अब आप बनारस को शायद आप लंदन या पेरिस बनाना चाहते हैं। और ऐसा होने के बाद बनारस शायद कभी याद नहीं किया जाएगा।

