पश्चिम बंगाल की सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा ने एक और दाव चल दिया है। राजनीति के जानकारों की नजर में इसे ट्रेन पॉलिटिक्स माना जा रहा है । उनका कहना है कि क्योंकि भाजपा राज्य में सत्ता में नहीं है, इसलिए वह सीधे तौर पर जनता से जुड़ने का मौका खोज रही थी और रेलवे के जरिए उसे यह मौका मिल गया है। जिस तरह से प्रवासी श्रमिकों को ध्यान में रखकर उत्तर बंगाल सहित पूरे राज्य में 11 नई ट्रेनों की घोषणा कर दी गई है और विभिन्न स्टेशनों को नए स्टॉपेज के रूप में मंजूरी दी गई है उससे यह साफ हो गया है कि बंगाल में भाजपा की ट्रेन पॉलिटिक्स है।
कभी रेलमंत्री ममता बनर्जी ने भी की थीं ट्रेन पॉलिटिक्स:
मिली जानकार यह भी कहते हैं कि यह कोई नई बात नहीं है पहले भी इस तरह के उदाहरण मिलते रहे हैं । वह बताते हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी दो बार रेल मंत्री रह चुकी हैं ।एक बार वह 1999 से 2001 तक रेल मंत्री रही और दोबारा वह 2009 में रेलमंत्री बनी । जब वह 2009 में रेलमंत्री बनी तो उन्होंने इसी ट्रेन पॉलिटिक्स का इस्तेमाल करके बंगाल में रेलवे के जरिए काफी काम किये। वाम सत्ता को रेल पॉलिटिक्स के जरिए चुनौती दी। उनके रेल मंत्री के रूप में किए गए बंगाल में घोषणाओं व काम की काफ की तारीफें भी हुई थी और देखा भी गया की 2011 में वह सत्ता में चली आईं। यही कारण है कि भाजपा भी रेल को पूरी तरह से बंगाल के राजनीतिक हित में साध रही है । आम बजट और रेल बजट आने में अभी कुछ दिन बाकी हैं और इससे पहले ही नई ट्रेनों की घोषणा बंगाल के लिए कर दी गई ।यह बात सीधे साबित करता है कि बीजेपी बंगाल की सत्ता हासिल करने के लिए हर दाव आजमा रही है। इस बार प्रधानमंत्री ने जिस तरह से मालदा में बंदे भारत स्लीपर एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया है, उससे यह समझा जा सकता है कि वह बंगाल नहीं बल्कि वंदे भारत के जरिए बंगाल और असम दोनों की पॉलिटिक्स को साधने की कोशिश किए हैं। यह तो शुरुआत है । अभी इस तरह के और भी कई तरह कदम भाजपा शासित केंद्र सरकार की ओर से अपनाए जाएंगे। बंगाल में जनता से जुड़ने के लिए इससे बेहतर कोई और उपाय हो ही नहीं सकता। हालांकि अब देखना है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है भाजपा शासित केंद्र सरकार और क्या-क्या उपहार बंगाल को देती है।
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