राजनीति बड़ी अजूबा चीज होती है। इसमें कोई अपना नहीं होता है। मौके के इंतजार में हर कोई होता है। मौका मिलते ही राजनीतिक दाव चल दिए जाते हैं। मुंबई महानगरपालिका समेत महाराष्ट्र के अन्य नगरपालिकाओं में चुनाव हुए भाजपा करीब करीब 22 से 23 कॉर्पोरेशन में वर्चस्व की स्थिति में है। चुनाव के समय एकनाथ शिंदे अधिकृत शिवसेना गुट के साथ भाजपा का गठबंधन था। दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा । बीएमसी में भाजपा को 89 सीट आए और शिंदे अच्छा को 29 सीट मिली। दोनों दलों ने मिलकर बीएमसी में 114 का बहुमत हासिल कर लिया। लगा कि अब कोई खतरा नहीं है।
मेयर पद के लिए ढाई ढाई साल के फार्मूले की शर्त:
बीजेपी का मेयर बनना तय था ,लेकिन अचानक से शिंदे गुट ने एक शर्त रख दी और उसकी शर्त है कि बीएमसी का मेयर ढाई ढाई साल का होना चाहिए। पहले ढाई साल बीजेपी का मेयर रहे और उसके बाद ढाई साल शिवसेना- शिंदे गुट का नेता मेयर बने,अब यहां आकर पेंच पांच गया है। लगे हाथ शिंदे गुट अपने पार्षदों को अलग होटल में शिफ्ट कर दिया है। मतलब साफ है । बीजेपी अगर वह नहीं मानती है तो शिंदे उद्धव गुट वाले शिवसेना या कांग्रेस के पक्ष में चल जाए। ऐसे में बीजेपी एक बड़ी मुश्किल में पड़ गई है। हालांकि राजनीति में अंतिम बात कोई नहीं होती है। जोड़-तोड़ होते हैं, एक दूसरे के साथ तालमेल बैठाये जाते हैं और फिर बातें बन जाती हैं। हो सकता है कि बीजेपी शिंदे गुट की शर्त पर मान जाए और ढाई साल के मेयर के फार्मूले पर बात बन जाए और बीजेपी को इतिहास का पहला मेयर मिले ।हालांकि कांग्रेस ,उद्धव ठाकरे गुट की कोशिश है कि किसी भी तरह से बीजेपी को मेयर बनने से रोका जाए। अब देखना है कि महाराष्ट्र में बीएमसी का गणित किस करवट बैठता है। जबकि संजय रावत पहले ही कह चुके हैं कि भाजपा के पास बहुमत से चार सीट अधिक है, ऐसे में आंकड़े कभी भी बदल सकता है।

