अरावली की पहाड़ियों को लेकर काफी शोर मचा हुआ है। दरअसल इसके पीछे कारण भी है। यह सीधे तौर पर प्राकृतिक के साथ छेड़छाड़ का मसला है। या फिर यह भी कह सकते हैं कि यह प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का नतीजा है। अगर अरावली की पहाड़ियां नहीं होगी तो क्या होगा ,यह एक सवाल है और इसका जवाब अलग-अलग हो सकते हैं । लेकिन इतना तो तय है की प्रकृति जो कुछ हमें दिया है ,वह हर चीज के एक मायने हैं। यदि अमेजॉन का जंगल एक बड़े भूभाग पर है तो उसका भी अपना एक अर्थ है। वह पूरे दुनिया को ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में मददगार है । करीब 20% ऑक्सीजन दुनिया को वहीं से मिलता है । इसी तरह अरावली की पहाड़ियों का भी अपना एक अलग महत्व है । यह पहाड़ियां पूरे राजस्थान, हरियाणा पंजाब और दिल्ली को थार मरुस्थल के तपिश से बचाती है। करीब 2.5 अरब बरस पहले इन पहाड़ियों का निर्माण हुआ था। भूगर्भ में हलचल का यह नतीजा था। बदलते समय के साथ इन्हीं पहाड़ियों के इर्द-गिर्द जीवन ने विकास किया । धीरे-धीरे अरावली की पहाड़ियां मनुष्य के जीवन की आधार बनीं । एक समय काल में विदेशी आक्रांताओं से सुरक्षा में भी इनकी हम भूमिका रही। जहां तक हम जानते हैं कि जब अकबर के साथ महाराणा प्रताप लड़ रहे थे तो इन्हीं अरावली की पहाड़ियों को वह अपना ठिकाना बनाते रहे। इन पहाड़ियों के लिए 2010 में सरकार ने एक मानक तय किया था । 3.7 डिग्री पर झुकी और 30 मीटर से नीचे तक की पहाड़ियों को अरावली माना गया। दरअसल अरावली एक पर्वत श्रृंखला है ,जो राजस्थान से लेकर हरियाणा होते हुए दिल्ली तक एक बड़े भूभाग पर फैली हुई है । लेकिन हाल के दिनों में इसके मानक बदल दिए गए और कहा गया कि 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों को अरावली नहीं माना जाएगा। ऐसा करने से उसे क्षेत्र में चल रहे प्राकृतिक संसाधनों के खनन में कंपनियों की चांदी होगी। अब पूरा का पूरा अरावली क्षेत्र उनके कब्जे में आ जाएगा और इसी बात को लेकर जबरदस्त तरीके से विरोध हो रहा है ।सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर किसके दबाव में यह मानक बदल दिए गए । आखिर इन पहाड़ियों को नष्ट करने पर क्यों लोग तुले हुए हैं। अगर यह पहाड़ी नहीं होगी तो भले ही आपको लगता हो कि कुछ नहीं होगा लेकिन प्राकृतिक संतुलन का खतरा आने वाले सैकड़ो सालों तक हम पर कहर बरपाती रहेगी। विशेषज्ञों ने भी इसकी चेतावनी दी है ।

